गर्भ में बच्चा खाना कब से शुरू होता है?HealthPlanet

Posted on Fri 11th Nov 2022 : 09:26

गर्भावस्था में कभी भी कुछ भी खाने का क्यों जी चाहता है?

मां बनना हर औरत का सपना होता है. गर्भधारण के बाद का अनुभव किसी भी महिला की ज़िंदगी का सबसे अच्छा अनुभव होता है.

गर्भावस्था के नौ महीनों में उसकी ज़िंदगी में हर रोज़ एक नया बदलाव आता है. उसके पहनने-ओढ़ने के तरीक़े से लेकर खान-पान, उठना-बैठना सब कुछ बदल जाता है. उसे वो सब खाने की तलब होने लगती है जो शायद उसने पहले कभी ना खाया हो. आधी रात हो या सुबह, जिस समय जिस चीज़ की तलब हुई, बस उसी वक़्त वो चीज़ हाज़िर होनी चाहिए.

आख़िर ऐसा क्यों होता है? क्या दुनिया भर की महिलाएं गर्भावस्था में इसी दौर से गुज़रती हैं?

अक्सर अनुमान ये लगाया जाता है कि गर्भावस्था में होने वाली तलब महिला या भ्रूण की कुछ पोषण संबंधी ज़रूरतें पूरी कर रही हैं.

गर्भावस्था यूं भी एक लंबी, थकाऊ और असुविधाजनक प्रक्रिया है. ऐसे में अगर कुछ मन चाहा खाने से मन को शांति मिलती है तो कोई हर्ज नहीं है.

रिसर्च से पता चलता है कि गर्भावस्था में होने वाली तलब हरेक संस्कृति में भिन्न है. उदाहरण के लिए, ग़ैर-अंग्रेज़ संस्कृति में अमरीका और ब्रिटेन की महिलाओं जैसी तलब नहीं होती. इसी तरह जापान में गर्भवती महिलओं को चावल की तलब ज़्यादा होती. तो. भारत में अक्सर प्रेगनेंट महिलाएं खट्टा खाने की मांग करती हैं.

जिस देश में जैसे खान-पान का चलन होता है, ललक भी उन्हीं चीज़ों की होती है. मिसाल के लिए जिसने कभी गोल-गप्पे ना खाए हों, उसे कभी भी गोल-गप्पे खाने का बड़ा तेज़ मन नहीं होगा.


जानकारों का कहना है कि बहुत मन होने पर, खाने से शरीर को ज़रूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं. बल्कि ग़ैर ज़रूरी वज़न बढ़ जाता है और कई प्रकार की समस्याएं खड़ी हो जाती हैं.

रिसर्च बताती हैं कि कुछ महिलाओं को माहवारी शुरू होने से हफ़्ते पहले चॉकलेट की क्रेविंग होने लगती है. अब ये पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि चॉकलेट खाने का मन होने से, क्या माहवारी से पहले किसी तरह के पोषक तत्व की कमी पूरी होती है. या सिर्फ़ हारमोन की वजह से ऐसा मन होता है.

एक प्रयोग के दौरान किसी मनोवैज्ञानिक ने एक महिला को चॉकलेट खाने को कहा. अगली मर्तबा उस महिला को चॉकलेट की तलब होने लगी. वहीं दूसरी ओर उसे सफ़ेद चॉकलेट खाने को दी गई, जिसे खाने के बाद उसकी चॉकलेट खाने की तलब शांत पड़ गई.

इससे साफ़ ज़ाहिर है कि डार्क चॉकलेट में शामिल कोकोआ चॉकलेट की तलब बढ़ाता है. ऐसा कोई पोषक तत्व नहीं है, जिसकी कमी पूरी करने के लिए शरीर उसकी मांग करता हो. रिसर्च में चॉकलेट और हारमोन का भी कोई संबंध सामने नहीं आया है.

ये साबित हो चुका है कि किसी चीज़ को खाने की अचानक बहुत तेज़ इच्छा होना, पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया है. शुरुआत धीरे-धीरे होती है. फिर वो तलब बन जाती है. किसी चीज़ को खाने का मन होना सामान्य बात है. और उसे नियंत्रित करना भी थोड़ा मुश्किल है. अगर हम अपने दिल को समझा लें कि फलां खाना हमारी सेहत के लिए अच्छा नहीं है, तो हम ख़ुद को रोक भी सकते हैं. अगर तब भी मुश्किल हो तो सिर्फ़ इतना ही खाएं कि उसकी तेज़ इच्छा शांत हो जाए.

किसी चीज़ के लिए तलब बढ़ना सिर्फ़ समझ का फेर है. एक आम धारणा है कि गर्भावस्था में तरह-तरह की चीज़ें खाने का मन होता है. इसीलिए महिलाएं हर तरह की चीज़ खाना अपना अधिकार समझने लगती हैं. भारत में गर्भावस्था में खट्टा खाना सामान्य माना जाता है. जबकि ऐसा सभी महिलाओं के साथ नहीं होता. अगर डॉक्टर ऐसा करने से मना करते हैं, तो महिलाएं ख़ुद को रोकती भी हैं.

जानकारों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाएं अक्सर डिमांडिंग हो जाती हैं. उन्हें पति और परिवार का पूरा समर्थन भी मिलता है. जब परिवार और पति, उस महिला की मुराद पूरी कर देते हैं, तो मन को तसल्ली हो जाती है कि परिवार में उनकी परवाह करने वाले लोग हैं.

गर्भावस्था में अजीब-अजीब चीज़ें खाने की तलब सिर्फ़ मनोवैज्ञानिक है और कुछ नहीं. ज़रूरी ये है कि इस दौरान आप ऐसी चीज़ें खाएं, जो मां और बच्चे दोनों के लिए फ़ायदेमंद हों.

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